नियतीचक्रपरिवर्तन प्रदक्षिणा
Posted in Hindiइस प्रदक्षिणा की वजह से, इन २४ गुरुतत्त्वों की उपासना, पूजन, निदिध्यास के कारण रोगजंतुओं का रूपांतरण टीके में हुआ, बैक्टीरिया का रूपांतरण ‘व्हैक्सीन’ में हुआ, अर्थात् जिससे रोग होता है, उसका रूपांतरण रोगनिवारक में हुआ| इसका अर्थ यह है कि जो चैनेल है, वह एक ही है, लेकिन विरुद्ध दिशा में उपयोग में लाया गया; जो आज तक अहितकारक, नुकसानदायक था, वही इस प्रदक्षिणा से हितकारक और उपायकारक बन गया| दुनिया की प्रत्येक चीज में अच्छे और बुरे गुण होते हैं| उनमें से अच्छे का स्वीकार और बुरे गुणो से इन्कार कैसे करना है, अर्थात अपने शरीर को, मन को, प्राण को, बुद्धि को एवं संपूर्ण जीवन को रोगमुक्त, खेदमुक्त, दुखमुक्त कैसे करना है, इसका मार्ग ही यह २४ गुरुतत्त्वों की प्रदक्षिणा अर्थात् नियतिचक्रपरिवर्तन प्रदक्षिणा है|
इस प्रदक्षिणा के कुल तीन अंग थे| -
१) निर्वृत्तशूर्प (निर्वृत्तशूर्प) द्वार व पृथक्कारिका द्वार
२) ईषद्पृथक्कारिका
३) दत्तात्रेय अवधूत के २४ गुरु
उपरी तीनों अंगो का बार बार अध्ययन करना, पढना, उसपर चिंतन करना तथा उसके अनुसार अपनी मनोबुद्धि में बदलाव लाने के लिए निरंतर प्रयास करना, यह इस प्रदक्षिणा का एक भाग था; वहीं, यह 'धन्य धन्य प्रदक्षिणा' अधिक से अधिक बार करना, उन २४ गुरुतत्त्वों का पूजन करना, 'धन्य धन्य प्रदक्षिणा' के विलक्षण मार्ग में शरीर से, मन से, बुद्धि से एवं प्राण से प्रवास करना, यह इसका दूसरा भाग था|
इस प्रदक्षिणा मार्ग की खासियत अर्थात प्रत्येक व्यक्ति यह प्रदक्षिणा करते समय उसके शरीर की गतिविधि इस प्रकार से हो रही थी कि हर एक की रीड की हड्डियों की गतिविधियों की दिशा में एवं रेखा में से ॐकार की आकृति तैयार हुई। अर्थात यह नियतीचक्रपरिवर्तन प्रदक्षिणा करते समय प्रत्येक व्यक्ति स्वयं किये कष्टों से, प्रयासों से और इन २४ गुरुतत्त्वों की साक्षी से ॐकार तैयार कर रहा था, यही इस प्रदक्षिणा की कुंजी (मर्म) थी |
सूप में रखीं फुल की पंखुड़ियाँ, बेल के पत्ते एवं पत्री को उन २४ गुरुतत्त्वों के प्रतीकों पर चढ़ाना था। यह प्रदक्षिणा करते समय उन २४ गुरुतत्त्वों के प्रतीकों की आराधना, पूजन एवं निदिध्यास करना था। फिर इन्हीं २४ गुरुतत्त्वों के कारण श्रद्धावानों के २४ चैनेल्स को उस सद्गुरुतत्त्व की कृपा प्राप्त होने का अवसर मिलनेवाला था।
इन सभी २४ गुरुतत्त्वों का पूजन करने के बाद दत्तात्रेय अवधूत की प्रतिमा पर पंचामृत का प्रोक्षण किया। बहुत ही विलोभनीय ऐसी इस अवधूत की प्रतिमा के सामने उनकी पादुका रखीं थीं। वहीं पर रखे पलाश के काष्ठों से उनपर पंचामृत का प्रोक्षण किया गया।
पश्चात् सूप में बाकी रहे तिनके और कंकरोंसहित ‘पृथक्कारिका’ द्वार से बाहर जाना था। इस पृथक्कारिका द्वार से बाहर आकर परमपूज्य अनिरुद्ध की ‘इशद् पृथ्क्कारिका’ अर्थात इष्ट करनेवाला यह कोलंडर (चालनी) था, जिसमे श्रद्धावान को अपने तिनके और कंकरों को रिक्त करना था। पूर्ण विश्वास से एवं दृढ भाव से इस सूप में जमा किये तिनके, कंकरों को उन्हें दे देना था। उसीसे अपना नियतिचक्र बदलने का मार्ग श्रद्धावान को प्राप्त होनेवाला था।
0 comments: